शान्ति का श्रोत क्या है ?

आज परमेश्वर कल्कि नाम से आपके बीच आये हैं। उनके आने का उद्देश्य क्या है ? आपको शान्ति देना। संसार जैसा शान्ति देता है वैसा शान्ति नहीं; ईश्वर आपको संसार के लोगों के जैसा शान्ति नहीं देंगे। इसलिए आपका मन व्याकुल न हो और आप न डरें। ईश्वर ने कहा कि मैं जानता हूँ कि जब आपके जीवन में दुःख – दर्द आता है, तब आप व्याकुल हो जाते हैं। जब आपके परिवार में विमारियां आती हैं तब आपका मन टूट जाता है। जब आप आर्थिक संकट में पड़ जाते हो तब आपका मन बौखला जाता है। इसलिए ईश्वर ने वादा किया कि जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शान्ति देती है ठीक उसी प्रकार मैं भी तुम्हें शान्ति दूंगा। परमेश्वर ने कहा कि मैं तुम्हें ऐसा बोल और बुद्धि दूंगा कि तुम्हारे सब विरोधी मिल कर भी उसका सामना या खंडन न कर सकेंगे। (more…)

आज परमेश्वर ने आपको क्या आज्ञा दी है ?

परमेश्वर की इच्छा थी कि मनुष्य हमारी आज्ञा को माने इसलिए उन्होंने धर्मशास्त्र में यह लिखवाया कि यदि तुम मेरे वचन को मानो तब मैं तेरा परमेश्वर होऊंगा, जिस मार्ग पर चलने की मैं तुम्हें आज्ञा दूँ उसी मार्ग पर चलो तब तुम्हारा भला होगा।इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सारी सृष्टि को रचने के बाद अपने स्वरूप के अनुसार मनुष्य को नर और नारी करके रचा और उनको आशीष दिया। मनुष्य परमेश्वर से संपर्क बनाये रखे इसके लिए उन्होंने मनुष्य के लिए कुछ नियम बनाये। उनकी इच्छा थी कि नर और नारी दोनों हमारा कहना माने ताकि हमसे बराबर संपर्क बनी रहे और उनको आशीष मिलता रहे । (more…)

ज्ञान की प्राप्ति होने पर भी आप दुःख क्यों पाते हैं ?

ईश्वर जीव पर कृपा करते हैं किन्तु अज्ञानी जीव उसका दुरूपयोग करते हैं। इसलिए वह दुष्ट बन जाता है। जब ईश्वर के ज्ञान को व्यवहारिक जीवन में अपना कर जब आप जिंदगी जिएंगे तब उसी वक्त आपको स्थिरता प्राप्त होगी, आपको शांति प्राप्त होगी और आपको आनन्द प्राप्त होगा।

ज्ञान जब तक शब्दात्मक है, तब तक शान्ति नहीं मिलेगी। जब वह ज्ञान क्रियात्मक होगा , जब वह ज्ञान सक्रिय होगा तभी शान्ति मिलेगी, तभी आनन्द मिलेगा, तभी वास्तविक सुख की प्राप्ति होगी । इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान को प्राप्त कराने वाले भक्ति भाव के साधनों की क्रियात्मक शिक्षा ग्रहण करे।

इन्हीं साधनों से सर्वात्मा एवं भक्त को अपने आत्मा का दान करने वाले भगवान प्रसन्न होते हैं। (more…)

परमेश्वर की प्राप्ति में निष्काम प्रेम की क्या भूमिका है ?

जो परमेश्वर से प्रेम करता है, परमेश्वर उसी को अपना मान बैठते हैं। और परमेश्वर जिसको अपना मानते हैं केवल उसी को अपना असली रूप दिखाते हैं। कली के शासन काल में परमेश्वर ने अपना नाम आप लोगों के आगे तो प्रकट कर रखा है परन्तु अपना रूप छिपा रखा है। जब आप परमेश्वर की प्रेम सहित भक्ति करेंगे तब परमेश्वर आप को अपने स्वरूप का दर्शन कराएँगे। इसलिए गीता में अनेक जगह परमेश्वर के दर्शन के लिए प्रेम – भक्ति दोनों का जिक्र किया गया है।

यह अक्षरः सत्य है कि यदि आप ज्ञानी हैं परन्तु आप परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं तो आप परमेश्वर के स्वरूप का दर्शन नहीं कर सकते हैं। यहाँ तक कि आप परमेश्वर का अनुभव भी नहीं कर सकते हैं। इस बात को याद रखें कि मांगने से प्रेम की धारा टूट जाती है, प्रेम का प्रमाण घटने लगता है। (more…)