हृदय को स्पर्श करने वाली भजन
हृदय को स्पर्श करने वाली भगवान कल्कि का भजन सुनें और भगवान कल्कि के स्वरुप का मनन करें।
हृदय को स्पर्श करने वाली भगवान कल्कि का भजन सुनें और भगवान कल्कि के स्वरुप का मनन करें।
हे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करने वाले लोगों ! जो परमेश्वर के साथ मेल कर लेता है, उसको हमेशा सुख की प्राप्ति होती है और जिसके हृदय में परमेश्वर बसता है वह जीवित ही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। परमेश्वर के शरणागत को कोई भी कष्ट नहीं होता है, उसको ताती हवा तक नहीं लगती, उसकी कृपा से दुःख नष्ट हो जाते हैं, रोग दूर हो जाते हैं और तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है।
आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना बहुत ही सरल है, लेकिन इसके लिए कुछ आवश्यक बातें भी जानना जरूरी है कि उस व्यक्ति का रहन – सहन और मन का सोच कैसा हो जो आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करना चाहते हैं । इसका वर्णन निम्न प्रकार है :- (more…)

कलियुग अर्थात कलि (सैतान) के शासन काल में परमेश्वर का स्मरण या परमेश्वर के नाम का जप या परमेश्वर के नाम का संकीर्तन ही भव सागर से पार जाने एक मात्र सरल उपाय है। जो फल सत्य युग में ध्यान करने से, त्रेता युग में बड़े – बड़े यज्ञ करने से और द्वापर युग में विधि पूर्वक पूजा करने प्राप्त होता है वही फल कलियुग में केवल परमेश्वर के नाम का जप या परमेश्वर के नाम का संकीर्तन या परमेश्वर का स्मरण करने से प्राप्त होता है। यूं तो चारों युगों में परमेश्वर के नाम का प्रभाव है किन्तु कलियुग में परमेश्वर के नाम का विशेष प्रभाव है। सभी धर्मग्रंथों में इस बात का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार आग के बिना दीपक नहीं जलाया जा सकता ठीक उसी प्रकार परमेश्वर का स्मरण या परमेश्वर के नाम का जप या परमेश्वर के नाम का संकीर्तन किए बिना इस कलियुग में भव सागर से पार नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर का नाम ही इस कलियुग में भव सागर से पार जाने के लिए सुदृढ़ जहाज है। (more…)

रहस्य का अर्थ होता है छिपा हुआ या गुप्त। यदि छिपा हुआ न हो तो रहस्य कहा ही न जायेगा। लोगों को मुक्ति क्यों नहीं मिलती है ? क्योंकि मुक्ति को प्राप्त करने का तरीका गुप्त है। हे भाई! देखो, नौका को तो जल में ही रहना है, किन्तु यदि जल नौका पर सवार हो जाय तो नौका डूब जाती है। ठीक उसी प्रकार मन को संसार में ही रहना है, किन्तु यदि मन को संसार के स्वरूप से हटा कर, मन को विषयों से हटा कर जब परमेश्वर में मिला दिया जाता है तो तभी मुक्ति मिल जाती है।
यदि सांसारिक वस्तु या सांसारिक रुप या सांसारिक विषय मन में आकर बैठ जाय तो मुक्ति कभी भी नहीं मिलेगी। जीवात्मा तन को छोड़ता है किन्तु वह मन को साथ ले चलता है। इसलिए मन को संभालो। पूर्व जन्म का शरीर तो मर गया है किन्तु मन नया शरीर लेकर आया है। शरीर तो मरता है किन्तु मन नहीं मरता है। (more…)

जो व्यक्ति पूर्व जन्म में अक्षय तप किया है, इस लोक में उसी को सच्चा गुरु मिलता है। ब्रह्म को प्राप्त करा देने वाला गुरु जन्मदाता माता – पिता से भी अधिक पूज्य है; क्योंकि पिता से प्राप्त जीवन तो नष्ट हो जाता है; परन्तु ब्रह्म रूप जन्म कभी भी नष्ट नहीं होता। ब्रह्मदत्त गुरु सबसे श्रेष्ट है। शिव के रुष्ट होने पर गुरु बचा लेते हैं; पर गुरु के रुष्ट होने पर शिव भी नहीं बचा पाते।सच्चाई यह है की जिसके द्वारा ब्रह्म विद्द्या का उपदेश होता है, वह परमेश्वर ही है ऐसा सभी धर्मशास्त्र कहता है। इस विद्द्या का बदला नहीं चुकाया जा सकता है। इसलिए गुरु के समीप शिष्य सदा ऋणी ही रहता है। जब गुरु प्रसन्न होते हैं तब वे खुद गुरु ऋण से शिष्य को मुक्त कर देते हैं; शिष्य गुरु ऋण को कभी भी चुकता नहीं कर सकता है। इसलिए तन – मन – वचन से सब प्रकार सदा तत्पर रहकर गुरु को संतुष्ट करना चाहिए। लेकिन गुरु वही सच्चा है जो अपने शिष्य को भगवान विष्णु का नाम दान में मन्त्र स्वरुप देता है। जो गुरु नाम-दान में भगवान विष्णु का नाम मन्त्र स्वरुप अपने शिष्य को दान के रूप में नहीं देता है वह शिष्यघाती है। (more…)