संसार में सबसे पहले प्रेम किसने किया – ईश्वर पुत्र अरुण

संसार में सबसे पहले प्रेम परमेश्वर ने मनुष्य से किया। इसलिए मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है। (धर्मशास्त्र ,१ यूहन्ना ४:१९) देखो परमेश्वर ने मनुष्य से कैसा प्रेम किया है कि मनुष्य परमेश्वर की सन्तान कहलाते हैं । (धर्मशास्त्र ,१ यूहन्ना ३:१)परमेश्वर ने कहा कि मेरी आज्ञा यह है कि “जैसा मैंने तुमसे प्रेम किया वैसा ही प्रेम तुम भी एक दूसरे से करो। ” (धर्मशास्त्र , यूहन्ना १५:१२) इसलिए धर्मशास्त्र, १ यूहन्ना ४ : ७ – ८ में यह भविष्यवाणी किया गया है कि “हम आपस में प्रेम रखें क्योंकि परमेश्वर प्रेम से है और जो कोई प्रेम करता है वह परमेश्वर से जन्मा है और परमेश्वर को जानता है। जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता।” धर्मशास्त्र, १ यूहन्ना ४:१६ में प्रेम के विषय में यहाँ तक कहा गया है कि परमेश्वर प्रेम है और जो परमेश्वर में बना रहता है,परमेश्वर भी उसमें बना रहता है। (more…)

परमेश्वर की आत्मा पाँच ब्रह्म से होकर मनुष्य के शरीर में किस प्रकार उतरी ? – ईश्वर पुत्र अरुण

ANAMI                             – GOD SELF

अनामी                               आदि सत / परम पुरुष

AGAM                             – KARYA BRAHM

अगम                                     कार्य ब्रह्म

ALAKH                            – VAIKUNTH

अलख                                  वैकुण्ठ

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परमेश्वर तक हम कैसे पहुंचे – ईश्वर पुत्र अरुण

16 पौड़ी वाला सीढ़ी लगा कर हम परमेश्वर तक पहुंच सकते हैं
01. गुदा / मूलाधार चक्र Rectum – Root Chakra
02. लिंग / स्वाधितं चक्र Ling/Genital – Sacral Chakra
03. नाभि / मणि चक्र Navel – Solar Plexus
04. दिल या हर्ट / अनाहत चक्र Heart – Chakra
05. कण्ठ या गला / विशुद्धा चक्र Throat – Chakra
06. आज्ञा चक्र /अजना चक्र /तीसरी आँख/दसम द्वार / एक आँख
Aagya Chakra/Ajna Chakra/Third Eye / Tenth Door / Single eye
a. इडा, पिंगला, सुषम्ना जंक्शन (more…)

प्रभु कल्कि ने अवतार ले लिया (ईश्वर पुत्र अरुण)

पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर कभी भी मनुष्य शरीर धारण नहींकरते हैं जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वह परमात्मा अगम्य ज्योति में रहता है, जो रुक्म वर्ण के हैं, जो ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अत्यन्त पड़े हैं, जो जानने योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य हैं, जो कार्य ब्रह्म से एक सौ करोड़ योजन दूर ऊर्जा नदी के पार रहते हैं, जिसको विज्ञजन वास्तविक गोलोक धाम कहते हैं, जिसको न सूर्य प्रकाशित कर सकता, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, जिस परम पद को प्राप्त कर मनुष्य संसार में वापस नहीं आते वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर सबका स्वामी, परमात्मा एवं परम सत्य है। वह भय से रहित है, उसे किसी से बैर नहीं, वह बहुत, भविष्य और वर्तमान से पड़े है, वह अयोनि है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह एक मात्र सत्य स्वरुप है।

चारो युगों में केवल उसकी ही सत्ता है। सत्य युग में भी उसकी ही सत्ता थी, त्रेता में भी उसकी ही सत्ता थी, द्वापर में भी उसकी ही सत्ता थी और कलियुग में भी उसकी ही सत्ता है। कल भी उसकी ही सत्ता थी, आज भी उसकी ही सत्ता है और आगे भी उसकी ही सत्ता मौजूद रहेगी। (more…)