Author - Aadishri Arun

परमेश्वर तक हम कैसे पहुंचे – ईश्वर पुत्र अरुण

16 पौड़ी वाला सीढ़ी लगा कर हम परमेश्वर तक पहुंच सकते हैं
01. गुदा / मूलाधार चक्र Rectum – Root Chakra
02. लिंग / स्वाधितं चक्र Ling/Genital – Sacral Chakra
03. नाभि / मणि चक्र Navel – Solar Plexus
04. दिल या हर्ट / अनाहत चक्र Heart – Chakra
05. कण्ठ या गला / विशुद्धा चक्र Throat – Chakra
06. आज्ञा चक्र /अजना चक्र /तीसरी आँख/दसम द्वार / एक आँख
Aagya Chakra/Ajna Chakra/Third Eye / Tenth Door / Single eye
a. इडा, पिंगला, सुषम्ना जंक्शन (more…)

प्रभु कल्कि ने अवतार ले लिया (ईश्वर पुत्र अरुण)

पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर कभी भी मनुष्य शरीर धारण नहींकरते हैं जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वह परमात्मा अगम्य ज्योति में रहता है, जो रुक्म वर्ण के हैं, जो ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अत्यन्त पड़े हैं, जो जानने योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य हैं, जो कार्य ब्रह्म से एक सौ करोड़ योजन दूर ऊर्जा नदी के पार रहते हैं, जिसको विज्ञजन वास्तविक गोलोक धाम कहते हैं, जिसको न सूर्य प्रकाशित कर सकता, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, जिस परम पद को प्राप्त कर मनुष्य संसार में वापस नहीं आते वह पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर सबका स्वामी, परमात्मा एवं परम सत्य है। वह भय से रहित है, उसे किसी से बैर नहीं, वह बहुत, भविष्य और वर्तमान से पड़े है, वह अयोनि है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह एक मात्र सत्य स्वरुप है।

चारो युगों में केवल उसकी ही सत्ता है। सत्य युग में भी उसकी ही सत्ता थी, त्रेता में भी उसकी ही सत्ता थी, द्वापर में भी उसकी ही सत्ता थी और कलियुग में भी उसकी ही सत्ता है। कल भी उसकी ही सत्ता थी, आज भी उसकी ही सत्ता है और आगे भी उसकी ही सत्ता मौजूद रहेगी। (more…)

कलियुग के 432000 वर्ष बीत चुके या कलियुग के अन्तिम चरण बीत चुके – ईश्वर पुत्र अरुण

श्रीमद्देवी भागवतम, स्कन्द – १ अध्याय – १ – 3, शीर्षक “28 व्यास का नाम ” पेज नं ० 25 के अनुसार 28 बार सत्ययुग, 28 बार त्रेता, 28 बार द्वापर युग बीत चुका है। प्रत्येक द्वापर में वेद व्यास जी अपने नए नाम से अवतार लेकर आते हैं और वेद को चार भागों में बाँट देते हैं। चुकि अब 28 वां द्वापर बीत चुका है इसलिए 28 बार वेद व्यास जी अपने नए नाम से अवतार लेकर आये और 28 बार वेद को चार भागों में बाँट चुके हैं । वेद व्यास जी का 28 नाम खुल्लम – खुल्ला श्रीमद्देवी भागवतम, स्कन्द – १ अध्याय – १ – ३, शीर्षक “28 व्यास का नाम ” पेज नं ० 25 में लिखा हुआ है।

स्कन्द पुराण, माहेश्वरी खंड – कुमारिका खंड, शीर्षक “महा काल द्वारा करंधम के प्रश्नानुसार श्राद्ध युग व्यवस्था का वर्णन ” पेज नं ० 129 में यह वयान किया गया है कि २७ बार कलियुग बीत चुका है और अब 28वां कलियुग चल रहा है। (more…)

अध्यात्म जगत की चेतावनी

आज परमेश्वर मनुष्य शरीर धारण कर पृथवी पर कल्कि नाम से अवतरित हुए हैं। आज परमेश्वर आपके जीवन में प्रकाश बनकर उपस्थित हुए हैं। आज परमेश्वर आपके जीवन में ख़ुशी का फूल खिलाने आए हैं। आज परमेश्वर आपके जीवन के पथरीली, झाड़ी एवं चट्टानों से भरी भूमि को हरा – भरा बनाने आए हैं। आज परमेश्वर आपको दुःख, पड़ेशानी एवं मृत्यु से बचाने आए हैं। परमेश्वर के लिए न तो कोई कर्तव्य है और न उन्हें किसी चीजों को प्राप्त करने की जरूरत ही है। (गीता ३:२२) फिर भी परमेश्वर समय – समय पर अवतार लेकर संसार का हित करने के लिए सब कार्य करते हैं। जिस युग में जितना कार्य आवश्यक है, परमेश्वर उसी के अनुसार अवतार लेकर उस कार्य को पूरा करते हैं। श्रीमद्भगवतम् महा पुराण १०;३३:३७ में महर्षि वेद व्यास जी ने कहा कि “जीवों पर कृपा करने के लिए ही परमेश्वर अपने आपको मनुष्य रूप में प्रकट करते हैं और ऐसी – ऐसी लीलाएँ करते हैं जिन्हें सुनकर जीव भगवत्प्रायण हो जाय।” (more…)

क्या आप परमेश्वर की अनुभूति प्राप्त करना चाहते हैं ?

प्रेम एक निर्मल झरना है । उसके प्रवाह में जो भी आ जाता है, वह निर्मल हो जाता है । जिस प्रकार पात्र और कुपात्र की घृणा जैसे झरने के स्वच्छ प्रवाह में नहीं होती है ठीक वैसे ही प्रेमी के अन्त़करण में किसी प्रकार की ईर्ष्या – द्वेष या घृणा की भावनायें नहीं होती । महात्मा गाँधी जी अपने आश्रम में अपने हाथों से एक कोढ़ी की सेवा-सुश्रुषा किया करते थे । इसमें उन्हें कभी भी घृणा पैदा नहीं होती थी । प्रेम की विशालता में ऊपर से जान पड़ने वाली मलीनतायें भी वैसे ही समा जाती हैं जैसे हमारी नदियों का कूड़ा कबाड़ समुद्र के गर्भ में विलीन हो जाता है । प्रेम आत्मा के प्रकाश से किया जाता है । आत्मा यदि मलीनताओं से ग्रसित है तो भी उसकी नैसर्गिक निर्मलता में अन्तर नहीं आता । यही समझकर उदारमनसे व्यक्ति अपनी सहानुभूति से किसी को भी वंचित नहीं करते । (more…)