काल के देश में कोई भी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता
काल एक निश्चित समय को कहते हैं। वह निश्चित समय पूरा होते ही वहाँ का सब कुछ समाप्त हो जाता है। काल देश में रचना का आधार है प्रकृति। प्रकृति ही सम्पूर्ण जगत को रचती है और प्रकृति ही सम्पूर्ण जगत का नाश करती है। गीता १४:३ में परमेश्वर ने कहा की मेरी महत् – ब्रह्म मूल – प्रकृति सम्पूर्ण भूतों (सृष्टयों) की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़ – चेतन के संयोग से सब भूतों (सृष्टयों) की उत्पत्ति होती है। भू, भुवः, स्वः (पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग) अर्थात पृथ्वी से लेकर ध्रुव लोक तक काल निर्मित देश है जो नाशवान है। इसलिए इस तीनों लोकों में से किसी भी लोक में मनुष्य रहे तो उसका नाश निशित ही है। स्वर्ग लोक से ऊपर केवल एक ही लोक महर्लोक है जो कल्प के अंत में जन-शून्य हो जाता है। (more…)
शांति कब प्राप्त होगी ? जब आपकी पड़ेशानी मिटा दी जाएगी, जब आपके दुखों को मिटा दी जाएगी, जब आपको विमारयों से मुक्त कर दिया जाएगा, जब आपके आँशू पोछ दिए जाएँगे। ऐसा कब होगा ? जब आप परमेश्वर के शरण में जायेंगे। क्योंकि परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपको दुखों से बहार निकाल देंगे । परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपको पड़ेशानी से बाहर निकल देंगे। परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपको विमारयों से मुक्त कर देंगे।परमेश्वर में सामर्थ्य है कि वे आपके सभी आँशुओं को पोछ देंगे। केवल जरूरत है आपको परमेश्वर के शरण में जाने की। आप परमेश्वर के राज्य की खोज करें क्योंकि परमेश्वर का राज्य खाना – पीना नहीं बल्कि धर्म, मिलाप और आनंद है जो पवित्र आत्मा से होता है।
परमेश्वर ने गीता ११:५४ में कहा कि अनन्य भक्ति के द्वारा मुझको प्रत्यक्ष देखना संभव है; परन्तु प्रश्न यह उठता है कि अनन्य भक्ति के साधन क्या हैं ?
अनामी लोक में जाने के लिए सही मार्ग एवं दूरी