परमेश्वेर की मनसा क्या है ? – ईश्वर पुत्र अरुण

परमेश्वेर की मनसा यह है कि जो लोग अन्त तक धीरज धरे रहेंगे उसी का उद्धार होगा। परमेश्वर जानते हैं कि अधर्म के बढ़ने से बहुत लोगों का प्रेम ठंढा हो जाएगा। इसलिए उन्होंने साफ – साफ लब्जों में कहा कि – “अधर्म के बढ़ने से प्रेम ठंढा हो जाएगा।परन्तु जो धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा।” (धर्मशास्त्र, मत्ती २४ :१३-१४)

परमेश्वऱ ने यह भी कहा कि “मेरे नाम के कारण सब लोग तुमसे बैर करेंगे पर जो अंत तक धीरज धरे रहेगा उसी का उद्धार होगा।” (धर्मशास्त्र, मत्ती १०:२२) मैं तुमसे सच कहता हूँ कि संसार और उसकी अभिलाषाएँ दोनों मिट मिटजाएँगे पर जो परमेश्वेर की इच्छा पर चलेगा , वह सर्वदा बना रहेगा। (धर्मशास्त्र, (more…)

गुस्सा व क्रोध क्यों उत्पन्न होता है तथा क्रोध व गुस्सा पर नियंत्रण क्यों और कैसे करें ?

क्या आपने सोचा है कि आपके मन में गुस्सा व क्रोध क्यों उत्पन्न होता है ? क्या आपने कभी सोचा है कि क्रोध व गुस्सा आपके लिए हानिकारक है या लाभदायक ? यदि यह आपके लिए हानिकारक है तो क्या आप जानते हैं कि क्रोद्ध व गुस्सा पर नियंत्रण कैसे करें ? ? ?

तमो गुण बढ़ने से अहंकार और अज्ञान उत्पन्न होता है तथा सब प्रकार के भेद अहंकार से उत्पन्न होते हैं। भेद उत्पन्न होते ही लोग एक दूसरे से तुलना करने लगते हैं तथा दूसरे में कमी निकालने लगते हैं। कमी निकालनेवाले नजरिए की वजह से सभी में कमी निकालना एक स्वभाव सा बन जाता है। अज्ञानता के कारण ही लोगों में सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति सच और झूठ में अंतर नहीं कर पाता है। ऐसे में व्यक्ति दूसरे पर दोषारोपण करने लगते हैं। दोषारोपण करने से क्रोध व गुस्सा उत्पन्न हो जाते हैं। (more…)

परमेश्वर कौन हैं और वे क्या कहना चाहते हैं ?

सृष्टि के आदि में केवल एक मात्र पूर्ण ब्रह्म ही थे जो प्रकाशित हो रहे थे। उस समय किसी भी चीजों की सृष्टि नहीं हुई थी। न दृश्य था और न द्रष्टा। न पृथ्वी बनी थी, न स्वर्ग और न आकाश। किसी भी चीजों की रचना नहीं हुई थी। पूर्ण ब्रह्म की इच्छा हुई की हम देखें और वे तीन भागों में विभक्त हो गए –

(१) जड़ प्रकृति / महा विष्णु (Lower Energy) (२) चेतन प्रकृति / गर्भोदकसाईविष्णु (Higher Energy) (3) परमेश्वर / पहिलौठा / क्षीरदाकोसाई विष्णु (Super Soul) (more…)

मनुष्य मंसाहारी कैसे हो गया ? – ईश्वर पुत्र अरुण

परमेश्वर ने सारी  रचना को रचने के बाद सबसे अंत में मनुष्य को बनाया और उनसे कहा  सुनो –

जितने बीज वाले छोटे – छोटे पेड़ सारी  पृथ्वी  के ऊपर हैं और जितने वृक्षों में बीज वाले फल होते हैं उन सबको तुमको भोजन के लिए दिए हैं। (धर्मशास्त्र, उत्पत्ति १ :२९) इस प्रकार परमेश्वर के कहने पर मनुष्य शाकाहारी भोजन करने लगा।

कुछ समय बीतने के बाद परमेश्वर ने क्या देखा कि सभी मनुष्यों ने अपना – अपना चाल चलन बिगार लिया है।मनुष्य की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है और उनके मन के विचार में जो कुछ उतपन्न होते हैं  वह निरंतर ही बुरा होता है। (more…)

मनुष्य की रचना कैसे हुई, मनुष्य का भोजनरुचि शाकाहारीसे मंसाहारी तक कब, क्यों और कैसे ? – ईश्वर पुत्र अरुण

सृष्टि के आदि में परमेश्वर ने सबसे पहले आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की। पृथ्वी बेडोल और सुनसान पड़ी थी और गहरे जल के ऊपर अँधियारा था तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मंडराता था। तब परमेश्वर ने कहा उजियाला हो, तो उजियाला हो गया। परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

फिर परमेश्वर ने कहा कि जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो की जल दो भाग हो जाय। तब परमेश्वर ने एक अंतर करके उसके निचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग – अलग किया और वैसा ही हो गया। परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया। (more…)